स्वामी समर्थ

स्वामी समर्थ का जीवन परिचय स्वामी समर्थ, जिनका वास्तविक नाम “स्वामी समर्थ रामकृष्ण” था, का जन्म 19वीं सदी के अंत में एक साधारण ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनका जन्म स्थान को लेकर विभिन्न मत हैं, लेकिन मुख्यतः उन्हें महाराष्ट्र के नासिक जिले में जन्मा उपासना बनाया गया है। स्वामी समर्थ का परिवार धार्मिक था, जिसने

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Swami Samarth

स्वामी समर्थांची थोरवी स्वामी समर्थ (Swami Samarth) हे एक अद्भुत व्यक्तिमत्व होते, ज्यांनी त्यांच्या भक्तांना आध्यात्मिक मार्गदर्शन केले. महर्षी दयानंद सरस्वती यांच्या वचनोंप्रमाणे, स्वामी समर्थ हे परब्रह्म म्हणजेच एकात्मतेचे प्रतीक होते. स्वामी समर्थांच्या शिकवण्या स्वामी समर्थांनी लोकांना शिकवले की, आत्मा आणि परमात्मा यांच्यातील संबंध साधल्यास जीवनात शांती आणि प्रसन्नता मिळते. त्यांनी ध्यान आणि साधना यावर

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श्री भैरव जी की आरती

श्री भैरव जी की आरती जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा, सुर नर सब करते, प्रभु तुम्हारी सेवा। तुम पापी उद्धारक दुःख सिंधु तारक, भक्तों के सुखकारक भीषण वपु धारक। वाहन श्वान बिराजत कर त्रिशूलधारी, महिमा अमित तुम्हारी जय जय भयहारी। तुम बिन देवा पूजन सफल नहीं होवे, चतुर्वर्तिका दीपक दर्शन, दुःख खोवे। तेल

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श्री रामायण जी की आरती

श्री रामायण जी की आरती आरती श्री रामायण जी की। कीरति कलित ललित सिय पिय की॥ गावत ब्रह्मादिक मुनि नारद | बाल्मीकि विज्ञान विसारद । सुक सनकादि सेष अरु सारद। बरनि पवनसुत कीरति नीकी ॥१॥ गावत वेद पुरान अष्टदस। छओ शास्त्र सब ग्रन्थन को रस। मुनिजन धन संतन को सर्वस। सार अंस सम्मत सबही की

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बृहस्पतिवार की आरती

बृहस्पतिवार की आरती ॐ जय बृहस्पति देवा, स्वामी जय बृहस्पति देवा। छिन-छिन भोग लगाऊं, कदली फल मेवा। ॐ जय० तुम पूर्ण परमात्मा तुम अन्तर्यामी। जगतपिता जगदीश्वर तुम सबके स्वामी। ॐ जय० चरणामृत निज निर्मल, सब पातक हर्ता। सकल मनोरथ दायक, कृपा करो भर्ता। ॐ जय० तन मन धन अर्पण कर, जो जन शरण पड़े। प्रभु

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बुधवार की आरती

बुधवार की आरती आरती युगल किशोर की कीजै, तन-मन-धन न्यौछावर कीजै । टेक । गौर श्याम मुख निरखत रीझै, हरि को स्वरूप नयन भरि पीजै । रवि शशि कोटि बदन की शोभा, ताहि निरखि मेरा मन लोभा । ओढ़े नील पीत पट सारी, कुञ्जबिहारी गिरवरधारी । फूलन की सेज फूलन की माला, रत्न सिंहासन बैठे

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श्री तुलसी जी की आरती

श्री तुलसी जी की आरती जय जय तुलसी माता । सब जग की सुख दाता वर दाता ॥१॥ सब योगों के ऊपर सब रोगों के ऊपर । अज से रक्षा करके भव त्राता ॥२॥ बटुपुत्री हे श्यामा सुरबल्ली हे ग्राम्या । विष्णुप्रिये जो तुमको सेवे सो तर जाता ॥३॥ हरि के शीश बिराजत त्रिभुवन से

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चिन्तपूर्णी देवी की आरती

चिन्तपूर्णी देवी की आरती चिन्तपूर्णी चिन्ता दूर करनी, जन को तारो भोली माँ । काली दा पुत्र पवन दा घोड़ा, सिंह पर भई सवार, भोली माँ ॥१॥ एक हाथ खड़ग दूजे में खंडा, तीजे त्रिशूल सम्भालो, भोली माँ ॥ चौथे हाथ चक्कर गदा पांचवें, छठे मुण्डों दी माल भोली माँ ॥३॥9 सातवें से रुण्ड-मुण्ड बिदारे,

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शाकुम्भरी देवी की आरती

शाकुम्भरी देवी की आरती हरि ॐ श्री शाकुम्भरी अंबा जी,की आरती कीजो । ऐसा अद्भुत रूप हृदय धर लीजो, शताक्षी दयालु की आरती कीजो ॥ तुम परिपूर्ण आदि भवानी माँ, सब घट तुम आप बखानी माँ ॥ श्री शाकुम्भर अंबाजी की आरती कीजो तुम्हीं हो शाकुम्भर,तुम ही हो शताक्षी माँ शिवमूर्ति तुम ही हो माया

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माँ अन्नपूर्णा की आरती -Maa Annapoorna kee Aaratee

माँ अन्नपूर्णा की आरती : Maa Annapoorna kee Aaratee बारम्बार प्रणाम मैया, बारम्बार प्रणाम ! जो नहिं ध्यावे तुम्हें अम्बिके, कहाँ उसे विश्राम । अन्नपूर्णा देवी नाम तिहारो, लेत होत सब काम । प्रलय युगान्तर और जन्मान्तर, कालान्तर तक नाम । सुर असुरों की रचना करती, कहाँ कृष्ण कहँ राम । चूमहिं चरण चतुर चतुरानन,

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